नमो बुद्धाय !
बुद्ध ज्ञान आश्रम
बोधगया पूरे संसार के रहने वाले बौद्धों के सबसे महान भूमि है. क्यों की बहुत ही समय के बाद जो इस संसार में जन्म लेने वाले महा पुरुष तथागत भगवान बुद्ध की सम्बुद्धत्व की प्राप्ति यहाँ हुआ था. इसलिए सारे बौद्ध धर्म के लोगों के लिए यह शुद्ध भूमि अपना मातृभूमि जैसा माना जाता है .
राग, लोभ, क्रोध, नफरत, जलन, मोह माया, अहंकार, घमंड इत्यादि ये सारे गंदगियों को सम्पूर्ण रूप से नष्ट करके मुक्ति एवं शांति को पाने के लिए तथागत भगवान बुद्ध ने एक सुन्दर मार्ग सारे देव मानव को बता दिया है. वह मार्ग का नाम है आर्य अष्टांगिक मार्ग . ये शुद्ध ज्ञान तथागत भगवान बुद्ध इस बोधगया शुद्ध धरती पे प्राप्त किए है. इसीलिए यह शुद्ध भूमि शान्ती को पसंद वाले तथा सत्य को अपनाने वाले लोगों के लिए भी महान है, उत्तम है.
तथागत भगवान बुद्ध की शुद्ध ज्ञान इस भारत देश से ख़त्म होते हुए वह सुन्दर रास्ता एक छोटा सा द्वीप में सुरक्षित हो गये है. वह सुन्दर द्वीप का नाम है श्री लंका. महान राजा सम्राट अशोक ने अपना पुत्र एवं पुत्री को इसलिए इस देश में भेजा गया है की भविष्य में श्री लंका में ही तथागत की बुद्ध साशन सुरक्षित होगा. श्री लंका का इतिहास में कई बार तथागत की बुद्ध सासन मिथ्या दृष्टी से तथा आक्रमण इत्यादी खतरे से बचाने के लिए महा पुरुष लोग जन्म लेते थे. तथागत की रास्ता को अपना जान से भी ज़्यादा वे लोग मानते थे. यह इतिहास किताबों में है, जैसे की महावंश , बोधिवंश, दाठावंश ,थूप्वंश इत्यादि.
२० वी शताब्दी के अन्त होते- होते तथागत की बुद्ध शासन बहुत ही कमज़ोर हो गया था. उस समय एक महा पुरुष का जन्म श्री लंका में हुआ था. उनका नाम है भन्ते ज्ञानानंद जी. वे हमारे गुरु भन्ते जी है. उन्हों ने कठिन दुःख पीड़ा को सहकर तथागत भगवान बुद्ध की शुद्ध ज्ञान जो मिथ्या दृष्टि से बचे हुए है, वह शुद्ध ज्ञान को पाने के लिए दीर्घ समय तक खोजते-खोजते थक गए थे. अन्त में अपना पूरा परिवार, घर द्वार तथा देश भी त्याग कर भारत के ऋषिकेश तक पहुँच गए थे. उन्होंने पूरा ६ साल तक हिमालय क्षेत्र में योग ध्यान साधना की तपस्या किये थे. वे एक दिन दृढ़ संकल्प लिए थे की “मैं हिमालय के वनों के अन्दर जाऊँगा और मुक्ति को खोजूँगा” . यह संकल्प बहुत ही खतरनाक है. क्योंकि हिमालय के वनों के गहराई में जो जाते है वो वापस कभी नहीं आते. उस दिन मध्यम रात्रि में उन के पास एक देवता आकर बताया की “ज्ञानानंद ! आप इधर क्या करते है? यहाँ तो तथागत बुद्ध का रास्ता नहीं है. बिना तथागत की आर्य रास्ते से कैसे मुक्ति मिलेगी ? आप वापस श्री लंका में जाइये, वहा अभी तक तथागत की बुद्ध ज्ञान सुरक्षित है. आप वहाँ जाकर उस रस्ते को पूरा कीजिए.” देवता क्षण होगये और गुरु भन्ते जी वापस अपना देश में चले गए . फिर गुरु भन्ते जी श्री लंका में जाकर तथागत की सारे उपदेशों को अध्ययन किये थे. तथागत भगवान बुद्ध की सारे उपदेश त्रिपिटक में अंतर्गत है. उस त्रिपिटक में ८४००० तथागत की उपदेश है. वे सारे उपदेश दस बार से ज़्यादा पड़कर तथागत की शुद्ध रास्ता समझ लिए है. फिर उनके मन में यह कारुणिक संकल्प उत्पन्न हुआ की ” जो मुझे मिले हुए तथागत की शुद्ध ज्ञान मैं दुसरो लोगों को भी बतादूंगा.” यह कारुणिक संकल्प से उन्होंने जंगल में एक छोटा सा आश्रम बनाए.
घास एवं मिट्टी से बनाए गये आश्रम को वे महामेव्नाव का नाम समर्पित किया गया था . महामेव्नाव का नाम तो बहुत पुराणी है. सम्राट अशोक के पुत्र अरहंत महा महिन्द्र भन्ते जी ने श्री लंका में जाकर श्री लंका के रहने वाले सभी लोगों को तथागत भगवान बुद्ध की शुद्ध उपदेश दिया है. उस समय श्री लंका के राजा, महाराज देवानम प्रियतिस्स ने अपना सुन्दर अशोक वाटिका (बाद में सम्राट अशोक की पुत्री अरहन्त संघमित्रा ने बोधगया से पीपल वृक्ष की डाली आशोक वाटिका में रोपा गया है, और अभी तक बोधी वृक्ष वहाँ पर विराजमान है.) बुद्ध सासन को पूजा किया. अरहन्त महिन्द्र भन्ते जी तथागत भगवान बुद्ध की बुद्ध सासन फैलाने के लिए वह अशोक वाटिका में आश्रम बनवाया. उन्होंने उस आश्रम को महामेव्नाव का नाम समर्पित किया. १४ अगस्त १९९९ हमारे गुरु भन्ते जी भी अपने आश्रम का नाम इसलिए समर्पित किए है की “इस महामेव्नाव आश्रम से बुद्ध की ज्ञान फैलजाए एवं इस गौतम बुद्ध सासन में से ही सभी लोग उत्तम चार आर्य सत्य को प्राप्त करें.” महामेव्नाव के आरम्भ में २०-३० लोग बुद्ध की ज्ञान सुनने के लिए गुरु भन्ते जी के पास आये थे. तथागत भगवान बुद्ध की शिक्षाएं सरल कोमल भाषा से समझाने के कारण गुरु भन्ते जी के उपदेश सभी लोगोंको अच्छी तरह से समझ मे आ गया था. इसलिए धीरे-धीरे धर्म सुननेवाले लोगों की संख्या अधिक हो गई. सबकुछ त्यागकर चीवर पहन कर भन्ते बनकर ब्रह्मचारी शील को पालन कर चार आर्य सत्य की प्राप्ति के लिए बुद्धिमान युवक लोग गुरु भन्ते जी के पास आ गये थे. प्रेम, दया, करुना एवं प्रज्ञा से भरे हुए, हमारे गुरु भन्ते जी उन लोगों को उत्तम निर्वाण की प्राप्त के लिए अपना शिष्य बनाये, और तथागत भगवान बुद्ध की शील समाधि, प्रज्ञा की राह को दिखला दिए, हमें गर्व है की हमें भी महान पुरुष गुरु भन्ते जी के शिष्य बन्ने का भाग्य मिला. अब हमारे गुरु भन्ते जी ६०० से अधिक शिष्यों के परम पूजनीय गुरु है.
कुछ समय में महामेव्नाव आश्रम शीघ्र से पूरे संसार में फैल गया. अभी श्री लंका में हर जगह में ४७ शाखाएँ बन गये. कनाडा, अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया इत्यादि विदेशों में भी महामेव्नाव आश्रम फैल गये. बुद्धिमानी स्त्रियों के लिए तथागत बुद्ध की रास्ते को अपनाकर ज्ञान की प्राप्ति के लिए अलग से अनागारिका (Nun) आश्रम बनाए थे. ये सारे पुण्य की कार्यो में गुरु भन्ते जी बहुत ही व्यस्त होगए. उन को मान सम्मान आदर, गौरव इत्यादि सारे लाभसत्कार मिलने पर भी उन की मन कुछ भी चीजों पर आसक्त नहीं हुआ. यह तथागत भगवान बुद्ध की ज्ञान का आश्चर्य है.
गुरु भन्ते जी भारत देश को बहुत ही प्यार करते है. इसलिए हर एक साल में दो तीन बार अपनी ध्यान साधना केलिए बोधगया आते रहते है. हमारे गुरु भन्ते जी दुनिया में कही भी जाएँगे तो जरूर बहुत लोगों का कल्याण होता है. हमारे महान भारत को भी गुरु भन्ते जी का कारुणिक दयानुकम्पा मिलगया. बहुत समय से गुरु भन्ते जी के मन में एक सुन्दर आशा थी की भारत देश में फिर भगवान बुद्ध की शान्ति का सन्देश फैल जाए. गुरु भन्ते जी का यह सुन्दर स्वप्ना दुनिया मे सबसे सुन्दर जगह से शुरुआत हो गया. वह सुन्दर जगह का नाम है बोधगया. अगर तथागत भगवान बुद्ध की ज्ञान भारत में फैल गया तो सारे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, लोगों के कल्याण ही होगा. क्योंकि ये भगवान बुद्ध की रास्ता बुद्धिमान लोगों को अपना सुख शान्ति के लिए प्रयास करने का एक सुन्दर मार्ग है. तथागत भगवान बुद्ध ने बताया है की यह मेरा ज्ञान सिर्फ बुद्धिमान लोगों के लिए ही है, ना ही मूर्ख जन को. ” इस तथागत की ज्ञान से मन की सारे गन्दगी नष्ट होती है. मन स्वस्त रहने पर शांति मिलजाती है. इसलिए तथागत की धर्म भारत के लिए भारतवासियों के लिए बहुत ही लाभदायक है.
हमारे गुरु भंते जी भारत की कल्याण के लिए बोधगया मे ही एक बौद्ध केंद्र स्थापित करना भारत के हम सभी का सौभाग्य है. बोधगया निरंजना (फल्गु) नदी के किनारे यह सुन्दर आश्रम २००७ में बनाया गया था. यह आश्रम का नाम है बुद्ध ज्ञान आश्रम. सुन्दर निरंजना नदी के किनारे बने हुए बुद्ध ज्ञान आश्रम से हर एक धर्म में, हर एक जात में, हर एक परिवार में, रहने वाले बुद्धिमान लोगों के लिए बहुत सुख कल्याण की सेवा होती है, यह आश्रम भारत देश को अँधेरा दूर करने वाले एक प्रदीप जैसा है. अब हमारा बुद्ध ज्ञान आश्रम से बहुत लोग लाभ उठाते है. जरुरी करके बच्चे लोग बुद्ध ज्ञान आश्रम के साथ जुड़े हुए है. हर एक रविवार के दिन धार्मिक पाठशाला चलती है. उस पाठशाला का नाम है, बुद्ध ज्ञान सन्डे स्कूल. यह बुद्ध ज्ञान सन्डे स्कूल से बच्चों के जीवन सफलता बनाने के लिए मदद मिलते है. जैसे की….
१. ध्यान साधना करके अपने मन को शुद्ध करना.
२. बड़े-बूड़े लोगों को आदर सत्कार सम्मान करना.
३. अपने माँ – पिता जी को सेवा सत्कार सम्मान करना.
४. तथागत भगवान बुद्ध की ज्ञान उपदेश सुनना.
५. भविष्य में अपनी देश की कल्याण करना.
६. भविष्य में बहुत बड़ा स्थान पर जाकर दूसरों को भी मदद करना.
७. अपना जीवन सफलता बनाना.
८. सारे पाप नहीं करना.
९. पुण्य का संचय करना.
१०. अपना देश शुद्ध रखना.
११. अपना काम स्वयम करना.
१२. पेड़ पौधा रोप कर पर्यावरण सुरक्षित रखना.
१३. पुर्निमा के दिन उपोसथ रखना.
१४. दूसरों को दान देना, तथा मदद करना.
इत्यादी तथागत भगवान बुद्ध की ज्ञान पुरे भारत देश की कल्याण के लिए भारत वासियों की सुख शान्ति के लिए बुद्ध ज्ञान आश्रम में सिखाया जाता है.
कोई- कोई बच्चे पढने में बहुत चतुर है. लेकिन उन्हें आगे बड़ने की क्षमता नहीं है, वैसे बच्चे लोगों को बड़े स्कूल में जाकर अपना पढाई करके जीवन सफलता बनाने के लिए बुद्ध ज्ञान आश्रम के तरफ से मदद मिलता है. कंप्यूटर सिखने वाले बच्चों को कंप्यूटर सिखाते है. और सारे लोगों की कल्याण के लिए घर-घर जाकर तथागत भगवान बुद्ध की शांति की उपदेश देते है. उस तरह अनेक कार्यों अभी बुद्ध ज्ञान आश्रम से होता रहता है.
तथागत भगवान बुद्ध की आशीर्वाद से गुरु भन्ते जी के कृपा से बुद्ध ज्ञान आश्रम भारत का एक ज्ञान स्थल बन गया. हमारे कामना है की आप बुद्ध ज्ञान आश्रम के साथ जुड़ जाइए और अपना इस जीवन का तथा अगले जीवन का सुख शान्ति को पाइए. भारत देश की अँधेरा दूर करने के लिए बोधगया में दीपक के प्रकाश जैसा चमकने वाले बुद्ध ज्ञान आश्रम सारे देव मानव का कल्याण के लिए हमेशा रोशन हो जाए!
आपको बुद्ध धम्म और संघ की शरण मिल जाए!

